Sunday, May 3, 2020

Love जिहाद से बचाव

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ट्रैन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की पिन है??" 

उसने अपने बैग से एक फोन निकाला था, और नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और सीट के नीचे से अपना बैग निकालकर उसके टूल बॉक्स से पिन ढूंढकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी। 

थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??"

वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। और एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी। 

लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों?? 

मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना"

लड़की बुदबुदाई  "ओह्ह "

मैंने दिलासा देते हुए कहा "इसमे कोई परेशानी की कोई बात नहीं"

वो अपने एक हाथ से दूसरा हाथ दबाती रही, मानो किसी परेशानी में हो। मैंने फिर विन्रमता से कहा "आपको कहीं कॉल करना हो तो मेरा मोबाइल इस्तेमाल कर लीजिए"

लड़की ने कहा "जी फिलहाल नहीं, थैंक्स, लेकिन ये सिम किस नाम से खरीदी गई है मुझे नहीं पता"

मैंने कहा "एक बार एक्टिव होने दीजिए, जिसने आपको सिम दी है उसी के नाम की होगी" 

उसने कहा "ओके, कोशिश करते हैं" 

मैंने पूछा "आपका स्टेशन कहाँ है??"

लड़की ने कहा "दिल्ली"

और आप?? लड़की ने मुझसे पूछा 

मैंने कहा "दिल्ली ही जा रहा हूँ, एक दिन का काम है,

आप दिल्ली में रहती हैं या...?"

लड़की बोली "नहीं नहीं, दिल्ली में कोई काम नहीं , ना ही मेरा घर है वहाँ"

तो ???? मैंने उत्सुकता वश पूछा

वो बोली "दरअसल ये दूसरी ट्रेन है, जिसमे आज मैं हूँ, और दिल्ली से तीसरी गाड़ी पकड़नी है, फिर हमेशा के लिए आज़ाद" 

आज़ाद?? 
लेकिन किस तरह की कैद से?? 
मुझे फिर जिज्ञासा हुई किस कैद में थी ये कमसिन अल्हड़ सी लड़की.. 

लड़की बोली, उसी कैद में थी जिसमें हर लड़की होती है। जहाँ घरवाले कहे शादी कर लो, जब जैसा कहे वैसा करो। मैं घर से भाग चुकी हुँ..

मुझे ताज्जुब हुआ मगर अपने ताज्जुब को छुपाते हुए मैंने हंसते हुए पूछा "अकेली भाग रही हैं आप? आपके साथ कोई नजर नहीं आ रहा? "

वो बोली "अकेली नहीं, साथ में है कोई"

कौन? मेरे प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे

दिल्ली से एक और ट्रेन पकड़ूँगी, फिर अगले स्टेशन पर वो जनाब मिलेंगे, और उसके बाद हम किसी को नहीं मिलेंगे..

ओह्ह, तो ये प्यार का मामला है। 

उसने कहा "जी"

मैंने उसे बताया कि 'मैंने भी लव मैरिज की है।'

ये बात सुनकर वो खुश हुई, बोली "वाओ, कैसे कब?" लव मैरिज की बात सुनकर वो मुझसे बात करने में रुचि लेने लगी

मैंने कहा "कब कैसे कहाँ? वो मैं बाद में बताऊंगा पहले आप बताओ आपके घर में कौन कौन है?

उसने होशियारी बरतते हुए कहा " वो मैं आपको क्यों बताऊं? मेरे घर में कोई भी हो सकता है, मेरे पापा माँ भाई बहन, या हो सकता है भाई ना हो सिर्फ बहने हो, या ये भी हो सकता है कि बहने ना हो और 2-4 गुस्सा करने वाले बड़े भाई हो" 

मतलब मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकता "मैंने काउंटर मारा"

वो बोली, 'कुछ भी नाम हो सकता है मेरा, टीना, मीना, रीना, अंजली कुछ भी' 

बहुत बातूनी लड़की थी वो.. थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने मुझे ट्रॉफी दी जैसे छोटे बच्चे देते हैं क्लास में, 
बोली आज मेरा बर्थडे है। 

मैंने उसकी हथेली से ट्रॉफी उठाते बधाई दी और पूछा "कितने साल की हुई हो?"

वो बोली "18" 

"मतलब भागकर शादी करने की कानूनी उम्र हो गई आपकी" मैंने काउंटर किया

वो "हंसी"

कुछ ही देर में काफी फ्रैंक हो चुके थे हम दोनों। जैसे बहुत पहले से जानते हो एक दूसरे को.. 

मैंने उसे बताया कि "मेरी उम्र 28 साल है, यानि 10 साल बड़ा हुँ"

उसने चुटकी लेते हुए कहा "लग भी रहे हो"

मैं मुस्कुरा दिया

मैंने उसे पूछा "तुम घर से भागकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर चिंता के निशान जरा भी नहीं है, इतनी बेफिक्री मैंने पहली बार देखी" 

खुद की तारीफ सूनकर वो खुश हुई, बोली "मुझे उन जनाब ने (प्रेमी ने) पहले से ही समझा दिया था कि जब घर से निकलो तो बिल्कुल बिंदास रहना, घरवालों के बारे में बिल्कुल मत सोचना, बिल्कुल अपना मूड खराब मत करना, सिर्फ मेरे और हम दोनों के बारे में सोचना और मैं वही कर रही हूँ"

मैंने फिर चुटकी ली, कहा "उसने तुम्हे मुझ जैसे अनजान मुसाफिरों से दूर रहने की सलाह नहीं दी?"

उसने हंसकर जवाब दिया "नहीं, शायद वो भूल गया होगा ये बताना"

मैंन

े उसके प्रेमी की तारीफ करते हुए कहा *" वैसे तुम्हारा बॉय फ्रेंड काफी टेलेंटेड

है, उसने किस तरह से तुम्हे अकेले घर से रवाना किया, नई सिम और मोबाइल दिया, तीन ट्रेन बदलवाई.. ताकि कोई ट्रेक ना कर सके, वेरी टेलेंटेड पर्सन"*

लड़की ने हामी भरी,बोली " बोली बहुत टेलेंटेड है वो, उसके जैसा कोई नहीं"

मैंने उसे बताया कि "मेरी शादी को 5 साल हुए हैं, एक बेटी  है 2 साल की, ये देखो उसकी तस्वीर" 

मेरे फोन पर बच्ची की तस्वीर देखकर उसके मुंह से निकल गया "सो क्यूट"

मैंने उसे बताया कि "ये जब पैदा हुई, तब मैं कुवैत में था, एक पेट्रो कम्पनी में बहुत अच्छी जॉब थी मेरी, बहुत अच्छी सेलेरी थी.. फिर कुछ महीनों बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी, और अपने ही कस्बे में काम करने लगा।" 

लड़की ने पूछा जॉब क्यों छोड़ी?? 

मैंने कहा "बच्ची को पहली बार गोद में उठाया तो ऐसा लगा जैसे स्वर्ग(जन्नत) मेरे हाथों में है, 30 दिन की छुट्टी पर घर आया था, वापस जाना था लेकिन जा ना सका। इधर बच्ची का बचपन खर्च होता रहे उधर मैं पूरी दुनिया कमा लूं, तब भी घाटे का सौदा है। मेरी दो टके की नौकरी, बचपन उसका लाखों का.." 

उसने पूछा "क्या बीवी बच्चों को साथ नहीं ले जा सकते थे वहाँ?"

मैंने कहा "काफी टेक्निकल मामलों से गुजरकर एक लंबी अवधि के बाद रख सकते हैं, उस वक्त ये मुमकिन नहीं था.. मुझे दोनों में से एक को चुनना था, आलीशान रहन सहन के साथ नौकरी या परिवार.. मैंने परिवार चुना अपनी बेटी को बड़ा होते देखने के लिए। मैं कुवैत वापस गया था, लेकिन अपना इस्तीफा देकर लौट आया।"

लड़की ने कहा "वेरी इम्प्रेसिव"  

मैं मुस्कुराकर खिड़की की तरफ देखने लगा

लड़की ने पूछा "अच्छा आपने तो लव मैरिज की थी न,फिर आप भागकर कहाँ गए??
कैसे रहे और कैसे गुजरा वो वक्त??

उसके हर सवाल और हर बात में मुझे महसूस हो रहा था कि ये लड़की लकड़पन के शिखर पर है, बिल्कुल नासमझ और मासूम छोटी बहन सी। 

मैंने उसे बताया कि हमने भागकर शादी नहीं की, और ये भी है कि उसके पापा ने मुझे पहली नजर में सख्ती से रिजेक्ट कर दिया था।" 

उन्होंने आपको रिजेक्ट क्यों किया?? लड़की ने पूछा

मैंने कहा "रिजेक्ट करने का कुछ भी कारण हो सकता है, मेरी जाति, मेरा काम, मेरा कुल कबीला,घर परिवार, नस्ल या नक्षत्र..इन्ही में से कोई काट होती है जिसके इस्तेमाल से जुड़ते हुए रिश्तों की डोर को काटा जा सकता है" 

"बिल्कुल सही", लड़की ने सहमति दर्ज कराई और आगे पूछा "फिर आपने क्या किया?"

मैंने कहा "मैंने कुछ नहीं किया,उसके पिता ने रिजेक्ट कर दिया वहीं से मैंने अपने बारे में अलग से सोचना शुरू कर दिया था। खुशबू ने मुझे कहा कि भाग चलते हैं, मेरी वाइफ का नाम खुशबू है..मैंने दो टूक मना कर दिया। वो दो दिन तक लगातार जोर देती रही, कि भाग चलते हैं। मैं मना करता रहा.. मैंने उसे समझाया कि *"भागने वाले जोड़े में लड़के की इज़्ज़त पर पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता, जबकि लड़की का पूरा कुल धुल जाता है। फिल्मों में नायक ही होता है जो अपनी प्रेमिका को भगा ले जाए और वास्तविक जीवन में भी प्रेमिका को भगाकर शादी करने वाला नायक ही माना जाता है। लड़की भगाने वाले लड़के के दोस्तों में उस लड़के का दर्जा बुलन्द हो जाता है, भगाने वाला लड़का हीरो माना जाता है लेकिन इसके विपरीत जो लड़की प्रेमी संग भाग रही है वो कुल्टा कहलाती है, मुहल्ले के लड़के उसे चालू ठीकरा कहते हैं। बुराइयों के तमाम शब्दकोष लड़की के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। भागने वाली लड़की आगे चलकर 60 साल की वृद्धा भी हो जाएगी तब भी जवानी में किये उस कांड का कलंक उसके माथे पर से नहीं मिटता। मैं मानता हूँ कि लड़का लड़की को तौलने का ये दोहरा मापदंड गलत है, लेकिन हमारे समाज में है तो यही , ये नजरिया गलत है मगर सामाजिक अस्तित्व में यही है, लोगों के अवचेतन में भागने वाली लड़की की भद्दी तस्वीर होती है।* मैं तुम्हारी पीठ को छलनी करके सुखी नहीं रह सकता, तुम्हारे माँ बाप को दुखी करके अपनी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर सकता।"

वो अपने नीचे का होंठ दांतो तले पीसने लगी, उसने पानी की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूंट अंदर सरकाया। 

मैंने कहा अगर मैं उस दिन उसे भगा ले जाता तो उसकी माँ तो शायद कई दिनों तक पानी भी ना पीती। इसलिए मेरी हिम्मत ना हुई कि ऐसा काम करूँ.. मैं जिससे प्रेम करूँ उसके माँ बाप मेरे माँ बाप के समान ही है। चाहे शादी ना हो, तो ना हो।

कुछ पल के लिए वो सोच में पड़ गई , लेकिन मेरे बारे में और अधिक जानना चाहती थी, उसने पूछा "फिर आपकी शादी कैसे हुई???

मैंने बताया कि " खुशबू की सगाई कहीं और कर दी गई थी। धीरे धीरे सबकुछ नॉर्मल होने लगा था। खुशबू और उसके मंगेतर की बातें भी होने लगी थी फोन पर, लेकिन जैसे जैसे शादी नजदीक आने लगी, उन लोगों की डिमांड बढ़ने लगी"

डिमांड मतलब 'लड़की ने पूछा'

डिमांड का एक ही मतलब होता है, दहेज की डिमांड। परिवार में सबको सोने से बने तोहफे दो, दूल्हे को लग्जरी कार

चाहिए, सास और ननद को नेकलेस दो वगैरह वगैरह, बोले हमारे यहाँ रीत है। लड़का भी

इस रीत की अदायगी का पक्षधर था। वो सगाई मैंने येन केन प्रकरेण तुड़वा डाली.. फिर किसी तरह घरवालों को समझा बुझा कर मैं फ्रंट पर आ गया और हमारी शादी हो गई। ये सब किस्मत की बात थी.. 

लड़की बोली "चलो अच्छा हुआ आप मिल गए, वरना वो गलत लोगों में फंस जाती" 

मैंने कहा *"जरूरी नहीं कि माता पिता का फैसला हमेशा सही हो, और ये भी जरूरी नहीं कि प्रेमी जोड़े की पसन्द सही हो.. दोनों में से कोई भी गलत या सही हो सकता है..काम की बात यहाँ ये है कि कौन ज्यादा वफादार है।"*

लड़की ने फिर से पानी का घूंट लिया और मैंने भी.. लड़की ने तर्क दिया कि *"हमारा फैसला गलत हो जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें ग्लानि नहीं होनी चाहिए"*

मैंने कहा *"फैसला ऐसा हो जो दोनों का हो,बच्चो और माता पिता दोनों की सहमति, वो सबसे सही है। बुरा मत मानना मैं कहना चाहूंगा कि तुम्हारा फैसला तुम दोनों का है, जिसमे तुम्हारे पेरेंट्स शामिल नहीं है, ना ही तुम्हे इश्क का असली मतलब पता है अभी"*
उसने पूछा "क्या है इश्क़ का सही अर्थ?" 
मैंने कहा *"तुम इश्क में हो, तुम अपना सबकुछ छोड़कर चली आई  ये इश्क़ है, तुमने दिमाग पर जोर नहीं दिया ये इश्क है, फायदा नुकसान नहीं सोचा ये इश्क है...तुम्हारा दिमाग़ दुनियादारी के फितूर से बिल्कुल खाली था, उस खाली स्पेस में इश्क इनस्टॉल कर दिया गया। जिन जनाब ने इश्क को इनस्टॉल किया वो इश्क में नहीं है.. यानि तुम जिसके साथ जा रही हो वो इश्क में नहीं, बल्कि होशियारी हीरोगिरी में है। जो इश्क में होता है वो इतनी प्लानिंग नहीं कर पाता है, तीन ट्रेनें नहीं बदलवा पाता है, उसका दिमाग इतना काम ही नहीं कर पाता.. कोई कहे मैं आशिक हुँ, और वो शातिर भी हो ये नामुमकिन है।*

*मजनू इश्क में पागल हो गया था, लोग पत्थर मारते थे उसे, इश्क में उसकी पहचान तक मिट गई। उसे दुनिया मजून के नाम से जानती है जबकि उसका असली नाम कैस था जो नहीं इस्तेमाल किया जाता। वो शातिर होता तो कैस से मजनू ना बन पाता। फरहाद ने शीरीं के लिए पहाड़ों को खोदकर नहर निकाल डाली थी और उसी नहर में उसका लहू बहा था, वो इश्क़ था। इश्क़ में कोई फकीर हो गया, कोई जोगी हो गया, किसी मांझी ने पहाड़ तोड़कर रास्ता निकाल लिया..किसी ने अतिरिक्त दिमाग़ नहीं लगाया..*
*लालच ,हवस और हासिल करने का नाम इश्क़ नहीं है.. इश्क समर्पण करने को कहते हैं जिसमें इंसान सबसे पहले खुद का समर्पण करता है, जैसे तुमने किया, लेकिन तुम्हारा समर्पण हासिल करने के लिए था, यानि तुम्हारे इश्क में लालच की मिलावट हो गई ।*
लकड़ी अचानक से खो सी गई.. उसकी खिलख़िलाहट और लपड़ापन एकदम से खमोशी में बदल गया.. मुझे लगा मैं कुछ ज्यादा बोल गया, फिर भी मैंने जारी रखा, मैंने कहा *" प्यार तुम्हारे पापा तुमसे करते हैं, कुछ दिनों बाद उनका वजन आधा हो जाएगा, तुम्हारी माँ कई दिनों तक खाना नहीं खाएगी ना पानी पियेगी.. जबकि आपको अपने आशिक को आजमा कर देख लेना था, ना तो उसकी सेहत पर फर्क पड़ता, ना दिमाग़ पर, वो अक्लमंद है, अपने लिए अच्छा सोच लेता।*
*आजकल गली मोहल्ले के हर तीसरे लौंडे लपाडे को जो इश्क हो जाता है, वो इश्क नहीं है, वो सिनेमा जैसा कुछ है। एक तरह की स्टंटबाजी, डेरिंग, अलग कुछ करने का फितूर..और कुछ नहीं।*
लड़की का चेहरे का रंग बदल गया, ऐसा लग रहा था वो अब यहाँ नहीं है, उसका दिमाग़ किसी अतीत में टहलने निकल गया है। मैं अपने फोन को स्क्रॉल करने लगा.. लेकिन मन की इंद्री उसकी तरफ थी। 
थोड़ी ही देर में उसका और मेरा स्टेशन आ गया.. बात कहाँ से निकली थी और कहाँ पहुँच गई.. उसके मोबाइल पर मैसेज टोन बजी, देखा, सिम एक्टिवेट हो चुकी थी.. उसने चुपचाप बैग में से आगे का टिकट निकाला और फाड़ दिया.. मुझे कहा एक कॉल करना है, मैंने मोबाइल दिया.. उसने नम्बर डायल करके कहा *"सोरी पापा, और सिसक सिसक कर रोने लगी, सामने से पिता भी फोन पर बेटी को संभालने की कोशिश करने लगे.. उसने कहा पिताजी आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए मैं घर आ रही हूँ..दोनों तरफ से भावनाओ का सागर उमड़ पड़ा"*
हम ट्रेन से उतरे, उसने फिर से पिन मांगी, मैंने पिन दी.. उसने मोबाइल से सिम निकालकर तोड़ दी और पिन मुझे वापस कर दिया।
अंत तक इतनी लंबी कहानी पढ़ने का धन्यवाद 🙏🏻
( एक मित्र की वाल से-)

Love जिहाद से बचाव तथा देश की सभी बेटियों को समर्पित- *ये मेरा दावा है माता पिता से ज्यादा तुम्हे दुनिया मे कोई प्यार नहीं करता।*

कहानी पढ कर शेयर जरूर कीजिएगा।🙏🏻

*जय श्री राम*
*सदैव प्रसन्न रहिये*
*जो प्राप्त है-पर्याप्त है*

Saturday, April 25, 2020

रामायण के बाद हनुमानजी यहां चले गए थे और अब वे इन जगहों पर मिलते हैं...

रामायण के बाद हनुमानजी यहां चले गए थे और अब वे इन जगहों पर मिलते हैं...


चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥
चारों युग में हनुमानजी के ही परताप से जगत में उजियारा है। को छोड़कर और किसी देवी-देवता में चित्त धरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आज भी हनुमानजी हमारे बीच इस धरती पर सशरीर मौजूद हैं।

हनुमान इस कलियुग में सबसे ज्यादा जाग्रत और साक्षात हैं। कलियुग में हनुमान की भक्ति ही लोगों को दुख और संकट से बचाने में सक्षम हैं। बहुत से लोग किसी बाबा, देवी-देवता, ज्योतिष और तांत्रिकों के चक्कर में भटकते रहते हैं, क्योंकि वे हनुमान की भक्ति-शक्ति को नहीं पहचानते। ऐसे भटके हुए लोगों का राम ही भला करे। आजो जानते हैं कि हनुमानजी कहां कहां उपस्थित है।

1. जहां रामकथा वहां हनुमानजी
''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि। वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''
अर्थात : कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं।

सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥
यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्घा और विश्वास से इनका आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर तुलसीदासजी की भांति उसे भी हनुमान और राम-दर्शन होने में देर नहीं लगती।

2.चित्रकुट के घाट पर हनुमानजी

6वीं सदी के महान संत कवि तुलसीदासजी को हनुमानजी की कृपा से ही रामजी के दर्शन प्राप्त हुए। कथा है कि हनुमानजी ने तुलसीदासजी से कहा था कि राम और लक्ष्मण चित्रकूट नियमित आते रहते हैं। मैं वृक्ष पर तोता बनकर बैठा रहूंगा, जब राम और लक्ष्मण आएंगे मैं आपको संकेत दे दूंगा।

हनुमानजी की आज्ञा के अनुसार तुलसीदासजी चित्रकूट घाट पर बैठ गए और सभी आने- जाने वालों को चंदन लगाने लगे। राम और लक्ष्मण जब आए तो हनुमानजी गाने लगे 'चित्रकूट के घाट पै, भई संतन के भीर। तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर।।' हनुमान के यह वचन सुनते ही तुलसीदास प्रभु राम और लक्ष्मण को निहारने लगे।' इस प्रकार तुलसीदासजी को रामजी के दर्शन हुए।
3.पर हनुमानजी
हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद भागवत में वर्णन आता है। उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।
गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं। हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था।


4.श्रीलंका में हनुमान
सेतु एशिया नामक एक वेबसाइट ने दावा किया है कि श्रीलंका के जंगलों में एक आदिवासी समूह से हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद मिलने आते हैं। सेतु के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। इसका संबंध मातंग समाज से है जो आज भी अपने मूल रूप में है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है। यह समूह पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। हालांकि इस वेबसाइट के दावे में सचाई नजर नहीं आती।


पोलीस विभागातील हवालदारापासून ते सर्वोच्च पदापर्यंत क्रमाने कोणकोणती पदे असतात?


  1. पोलीस कॉन्स्टेबल
  2. सिनियर पोलीस कॉन्स्टेबल
  3. पोलीस हेड कॉन्स्टेबल
  4. असिस्टंट सब- इन्स्पेक्टर ऑफ पोलीस (ASI)
  5. सब इ्स्पेक्टर ऑफ पोलीस (SI)
  6. असिस्टंट इन्स्पेक्टर ऑफ पोलीस (API)
  7. इन्स्पेक्टर ऑफ पोलीस (INS)
  8. असिस्टंट कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा डेप्युटी सुप्रीटेंडन्ट ऑफ पोलीस (ACP or DSP)
  9. डेप्युटी कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा अॅडीशनल सुप्रीटेंडन्ट ऑफ पोलीस (ADL.DCP किंवा ASP)
  10. डेप्युटी कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा सुप्रीटेंडन्ट ऑफ पोलीस ( DCP किंवा SP)
  11. डेप्युटी कमिशनर ऑफ पोलीस (सिलेक्शन ग्रेड) किंवा सिनियर सुप्रीटेंडन्ट ऑफ पोलीस (DCP किंवा SSP)
  12. अॅडीशनल कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा डेप्युटी इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ पोलीस (ADL.CP किंवा DIG)
  13. जॉइंट कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ पोलीस (JCP किंवा IGP)
  14. कमिशनर ऑफ पोलीस किंवा डायरेक्टर जनरल ऑफ पोलीस (CP किंवा DGP, राज्य)
  15. डायरेक्टर ऑफ इंटेलीजन्स ब्युरो (DBI, भारत सरकार)
धन्यवाद.

मोहम्मद अली जिना बद्दल अधिक माहिती




Friday, April 24, 2020

1995 के पहले के बच्चे

हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी , 

पहला चरण   -   कैंची 

दूसरा चरण    -   डंडा 

तीसरा चरण   -   गद्दी ...

तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे. 
*तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।*

*"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे*।

और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और *"क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है* ।

*आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से महरूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था*।

हमने ना जाने कितने दफे अपने *घुटने और मुंह तोड़वाए है* और गज़ब की बात ये है कि *तब दर्द भी नही होता था,* गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।

अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और *अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में* ।

मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी!  *"जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं* ।

*इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए* !

और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।

और ये भी सच है की *हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी* ।

हम लोग  की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना तीन चरणों में सीखा !

*पहला चरण कैंची*

*दूसरा चरण डंडा*

*तीसरा चरण गद्दी।*

● *हम वो आखरी पीढ़ी  हैं*, जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।

● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं।

● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और नावेल पढ़े हैं।

● *हम वही पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं।

● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही  बचपन गुज़ारा है।

● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।

● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी,  किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है।

● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है।

● *हम वो आखरी लोग हैं*, जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे।

● *हम वो आखरी लोग हैं*, जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने गुड़  की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है। 

● *हम निश्चित ही वो आखिर लोग हैं*, जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो और बिनाका जैसे  प्रोग्राम सुने हैं।

● *हम ही वो आखिर लोग हैं*, जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे। वो सब दौर बीत गया। चादरें अब नहीं बिछा करतीं। डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।

● *हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं*, जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए। अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं। *हम ही वो खुशनसीब लोग हैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है...!!*

*हम एक मात्र वह पीढी है*  जिसने अपने माँ-बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे है. 
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ये पोस्ट जिंदगी का एक आदर्श स्मरणीय पलों को दर्शाती है l

Wednesday, April 22, 2020

*उत्तम असामान्य ज्ञान*

*उत्तम असामान्य ज्ञान*
 
हे आपणास माहित आहे का?

1. गरम पाणी गार पाण्यापेक्षा लवकर गोठते.
2. मोनालिसाच्या चित्राला *भुवया* नाहीत.
3. "The quick brown fox jumps over the lazy dog" हया इंग्रजी वाक्यात *इंग्रजीचे सर्व अक्षर* आलेले आहेत.
4. *जीभ* हे आपल्या शरीरातील सर्वात जास्त मजबूत स्नायू आहे.
5. मुंग्या अजिबात झोपत नाहीत.
6. "I am." हे इंग्रजीतील *सर्वात संक्षिप्त पूर्ण वाक्य* आहे.
7. कोका कोला हे शीत पेय मूलतः हिरव्या रंगाचे होते.
8. जगात सर्वात जास्त ठेवले जाणारे नाव *मोहम्मद*
9. जेव्हा चन्द्र बरोबर आपल्या डोईवर येतो तेव्हा आपले वजन नेहमी पेक्षा जरासे कमी भरते.
10. वाळवंटातील उडणाऱ्या वालुकणापासून बचावासाठी *उंटाला तीन पापण्या* असतात.
11. "abstemious" आणि "facetious" हे फक्त दोनच शब्द आहेत ज्यात *इंग्रजीचे स्वर क्रमबध्द* आले आहेत.
12. सर्व खण्डांची इंग्रजीतील नावे ज्या अक्षराने सुरू होतात त्यात अक्षराने संपतात.
13. अमेरिकेत दरमाणसी दोन क्रेडिट कार्डस् आहेत.
14. TYPEWRITER हा इंग्रजी टंकलेखन यंत्रावरील एकाच ओळीतील कळदाबून टाईप होणारा सर्वात लांब शब्द आहे. 
15. उणे चाळीस डिग्रीला सेल्सीअस व फॅरेनहाईट दोन्ही उणे चाळीसच असतात.
16. चाॅकलेट खाल्याने कुत्र्याचा मृत्यू होवू शकतो. कारण चाॅकलेटमधील थिओब्रोमाईड या रसायनाचा कुत्र्याच्या हृदयावर व नर्व्हससिस्टिमवर विपरित परिणाम होतो.
17. स्त्रिया तेवढ्याच वेळात पुरुषां पेक्षा दुप्पटवेळा पापण्या ब्लिंक करतात.
18. आपलाच श्वास रोखून आपण आत्मघात करू शकत नाही.
19. ग्रंथालयातून सर्वात जास्त चोरले गेलेले पुस्तक "गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकाॅर्ड" तशी नोंद गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रेकाॅर्ड मध्ये नमूद आहं.
20.  डुकराना आकाशाकडे पाहता येत नाही.
21. "sixth sick sheikh's sixth sheep is sick" हे इंग्रजीतील सर्वात उच्चारणास अवघड वाक्य मानले जाते. 
22. "Rhythm" हा इंग्रजीतील स्वर रहीत सर्वात लांब शब्द आहे.
23. आपण खूप जोरात शिंकलो तर बरगडी फ्रॅक्चर होवू शकते व जर शिंक दाबली तर डोक्यातील वा मानेतील रक्तवाहीनी फुटून मृत्यू ओढवू शकतो.
24. पत्त्यातील चारही राजे महान राज्यांचे चित्र आहेत. 
- इस्पिक - राजा डेव्हिड
- चिलावर - अलेक्झांडर
- बदाम - चार्लेमॅग्ने
- चौकट - जुलियस सिझर
25. आपल्या जिभेने आपल्याच भुवया चाटणे अशक्य आहे.
26. 11,11,11,111 × 11,11,11,111 = 12,34,56,78,98,76, 54, 321
27. ज्या पुतळ्यातील घोड्याचे दोनही पाय हवेत असतात त्याचा स्वार युध्दात मरण पावलेला असतो, तर एक पाय हवेत असेल तर स्वाराचा युध्द-जखमांमूळे मृत्यू झालेला असतो व जर घोड्याचे चारही पाय जमीनीवर असतील तर स्वाराचा नैसर्गिक मृत्यू झालेला असतो.
28. गोळीरोधक जाकेट, आगनिरोधक, कारचे वायपर व लेसर प्रिंटर्स हे सर्व स्त्रीयांनी शोधलेली साधने आहेत.
29. *मध* हे एकमेव खाद्यान्न चीरकाल टिकते.
30. मगरीला आपली जीभ बाहेर काढता येत नाही.
31. साप तीन वर्षांपर्यत झोपू शकतो.
32. सर्व विषुवृत्तिय अस्वल डावरे असतात.
33. विमानात द्यावयाच्या सॅलड मधून प्रत्येकी केवळ एक ओलिव्ह कमी करुन अमेरिकन विमान कंपनीने 1987 मध्ये 40,000 डाॅलर्स वाचवले होते.
34. फुलपांखरे पायांनी चव अनुभवतात. 
35. हत्ती हा एकमेव प्राणी आहे जो उडी मारु शकत नाही.
36. मागल्या 4000 वर्षांमध्ये एकही प्राणी मानसाळला गेलेला नाही. 
37. मृत्युपेक्षा कोळ्याला घाबरणाऱ्यांची संख्या मोठी आहे.
38. Stewardesses हा इंग्रजी टंकयंत्रावर डाव्याहाताने टाईप केलेला सर्वात लांब शब्द आहे.
39. मुंग्या विष प्राशना नंतर नेहमी आपल्या उजवीकडे कलतात व मरतात.
40. विज दाहिनीचा शोध एका दंतवैद्याने लावला आहे.
41 रक्ताचा तीस फुट फव्वारा मारु शकेल इतका फोर्स हृदय निर्माण करते. 
42. उंदिरांची संख्या अकल्पित प्रमाणात वाढते; अगदी दोन उंदीर अठरा महिन्यात दहालाख होवू शकतात. 
43. इअरफोन एकतास वापरल्यास कानात नेहमीपेक्षा 700पट विषाणू वाढतात.
44. सिगारेटलायटरचा शोध आगपेटीच्या आधी लागलेला होता.
45. बोट-ठशांप्रमाणेच प्रत्येकाचे जीभ-ठसेसुध्दा वेगवेगळे असतात.
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ही पोस्ट मला इंग्रजीतील मिळाली. ती वाचन सुविधेस्तव मराठीत केली आहे. यातील बऱ्याच गोष्टी मलाही माहित नव्हत्या. असो.                    ♨️♨️♨️♨️♨️♨️🖕🖕🖕🖕🖕🖕आपलाच

Monday, April 13, 2020

डॉ० बाबा साहेब अम्बेडकर और ब्राह्मण......

डॉ० बाबा साहेब अम्बेडकर और ब्राह्मण......

   
     बहुत समय से दलित समाज में क्रांतिकारी नेताओं के विषय में एक नवीन एवं महत्वपूर्ण मापदंड दिखाई दे रहा है। ऐसे वक्ता-नेता जो दलित समाज की सभाओं में ब्राह्मणों की जमकर बुराई करे, हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाये, साथ ही गांधी जी के विरुद्ध अपमानजनक भाषण करे, वे महान क्रांतिकारी एवं प्रगतिशील माने जाते है। उन्हें तालियों की गड़गड़ाहट से नवाजा जाता है। यह सब होता है - पूज्य बोधिसत्व डा० बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम पर। कितने ही लोगों ने बाबा साहेब जैसे देशभक्त की आड़ लेकर 'दलित स्तान' तक की घोषणा करने की धृष्टता की है। आइये, हम सब बाबा साहेब के जीवन की अनेक सच्चाइयों को जानें और उस पर गम्भीरता से विचार करें।
         बरसात में भीगे हुए छोटे से भीम को अपना ब्राह्मणत्व भूल अपने घर ले जा कर पत्नी के हाथों गरम पानी से अपने ब्राह्मण पुत्र के साथ स्नान करवाने वाले अपने शिक्षक पेंडशे गुरुजी को याद करते हुए बाबा साहब अपने 50 वें जन्मदिन पर बोले ''.........
पाठशाला जीवन का वह मेरा पहला सुख था !''
बालक भीमा का कुलनाम आंबाव डेकर था जो कि अपेक्षाकृत बड़ा एवं कठिन होने के कारण अनके ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा जी केशव अम्बेडकर को अखरता था। उन्होंने बालक भीम से कहा कि इतने कठिन और अटपटे कुलनाम के स्थान पर मेरा कुलनाम  अम्बेडकर अपना लो - और गुरु जी ने पाठशाला के केटलाग - रजिस्टर सहित सभी स्थानों पर भीमा का कुलनाम अम्बेडकर लिख दिया । आज यह ब्राह्मण कुलनाम करोडों नागरिकों के लिये आदर्श है।
        आर्मी कैम्प स्कूल सताता में जाति भेद-भाव न के बराबर था। वहीं पर कृष्णाजी केशव अम्बेडकर (१८५५-१९३४) शिक्षक थे (उनके पिता केशव अम्बेडकर स्थानीय शिव मंदिर में पुजारी थे) Iश्री कृष्णाजी अपने सभी शिष्यों के प्रति समभाव रखते थे। पाठशाला में मध्याह्न अवकाश के समय जब भीमा अपने घर भोजन के लिए जाता और देर से लौटता तो गुरु जी को बुरा लगता था। इसलिए गुरुजी अपने टिफिन में थोड़ी आधिक सब्जी और रोटी लाते तथा बड़े प्यार से अपने हाथों से भीमा को देते।
        डॉ० अम्बेडकर को इस सब्जी व रोटी की मिठास जीवन भर याद रही। अपने ६०वें जन्मदिन पर आयोजित नरे पार्क (मुम्बई) की विशाल जनसभा में इस गौरवपूर्ण प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, "....... विद्यालय जीवन की मेरी यह दूसरी मीठी याद है I" उन्होंने बताया कि १९३० की गोलमेज परिषद कार्य के लिये चुने जाने पर गुरूजी ने जो अभिनंदन पत्र उन्हें भेजा था, उसे आज तक उन्होंने संभालकर रखा है। जब गुरुजी अपने शिष्य से राजगृह (दादर) मिलने पहुँचे तो शिष्य अम्बेडकर ने अपने ब्राह्मण गुरु को दंडवत प्रणाम कर श्रीफल, धोती, चादर एवं सवा रुपया अर्पित कर सम्मानित किया। दिनांक २२-१२-१९३४ को गुरुजी का देहावसान हुआ जिसे जानकर अम्बेडकर को अपार दुःख पहुँचा।
          भारतीय मजदूर सभा के जनक (मराठी साहित्यकार वा० मृ० जोशी के बड़े भाई) ब्राह्मण नारायण मल्हावराय जोशी १९० २-१९०६ में मुम्बई की एलफिस्टन हाईस्कूल में अम्बेडकर के कक्षा चार्य (क्लास टीचर)थे। उन्होंने छात्र अम्बेडकर को कक्षा की अंतिम पक्ति से उठाकर प्रथम पंक्ति में बैठाया और उनसे गणित का सवाल ब्लैकबोर्ड पर हल करवाया । आगे चलकर गोलमेज सभा में अम्बेडकर ने भारतीय मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया।
           मैट्रिक से आगे अध्ययन के लिए बड़ौदा नरेश सयाजीराव की छात्रवृत्ति पाने हेतु बम्बई में अम्बेडकर की महाराज से मुलाकात करवाने वाले यान्दे भी ब्राह्मण ही थे। गिरगाँव में उनका 'निर्णय सागर' नामक एक प्रेस था। बड़ौदा राज्य का सम्पूर्ण साहित्य-गजेट आदि वहीं छपता था। इसी कारण वह महाराजा गायकवाड के घनिष्ट सम्पर्क में थे। दादा केलुस्कर ( भंडारी जाति) उनके साथ गए थे। बाबा साहेब की महाराजा से जान-पहचान यान्दे जी ने ही करवाई थी। विदेश में उच्च अध्ययन हेतु छात्रवृत्ति एवं आर्थिक सहायता के लिये दिनांक ४-७-१९१३ को बड़ौदा राज्य एवं भीमराव अम्बेडकर के मध्य अनुबंध-पत्र दाखिल किया गया जिसके लेखक एवं अम्बेडकर की तरफ से जिम्मेदारी लेने वाले त्रिभुवन जे. व्यास एवं ए. जी.जोशी ब्राह्मण ही थे।
          बहिष्कृत हितकारिणी सभा (१९२४) के अध्यक्ष चीमन लाल सेतलवाड ब्राह्मण थे। महाड़ सत्याग्रह (कोलाब जिला बहिष्कृत परिषद दिनांक १९-२० मार्च १९२७) में कार्यक्रम के अंत में डॉ० अम्बेडकर के नेतृत्व में जुलूस निकालकर 'चवदार' तालाब में प्रवेश करके पानी पीने का प्रस्ताव रखने वाले अनंतराव विनायक चित्रे (१८९४-१९५९) कायस्थ थे जिन्होंने आगे चलकर अम्बेडकर के 'जनता' साप्ताहिक के सम्पादक के रूप में वर्षों तक अपनी सेवाएं दी। चित्रे जी ने १९२८ में इंदौर में दलित विद्यार्थियों के लिये छात्रावास भी खोला।
          महाड़ सत्याग्रह के अनुक्रम में ब्राह्मण गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृति दहन का प्रस्ताव रखा और दिनांक २५.१२.१९२७ को सायं ७ से ९ बजे तक दलित साधुओं के साथ मनुस्मृति की होली जलाई। आगे चलकर वह भी 'जनता ' के सम्पादक पद पर वर्षों तक रहे। सार्वजनिक स्थानों पर दलितों के प्रवेश का प्रस्ताव प्रस्तुत करने वाले सीताराम केशव बोले भी भंडारी (१८६९-१९६१) थे।
          समता संघ की पत्रिका 'समता' के सम्पादक देवराम विष्णु नाइक गोवर्धन ब्राह्मण थे जो आगे चलकर 'जनता ' साप्ताहिक के संपादक बने। आप बाबा साहब के विश्वास पात्र साथी थे।
          महाड़ सत्याग्रह केस (२० मार्च १९२७) दीवानी मुकदमा ४०५/१९२७ में शंकराचार्य डा० कृतकोटि ने डा० अम्बेडकर के पक्ष में गवाही दी। इस गवही को नोट करने वाले कोर्ट कमीशन भाई साहब मेहता ब्राह्मण थे। इस मुकदमें का न्याय निर्णय डा० अम्बेडकर के पक्ष में हुआ और यह निर्णय देने वाले न्यायमूर्ति वि.वि. पंडित भी ब्राह्मण थे। १० वर्ष पश्चात् १७-३-१९३७ को हाईकोर्ट ने डा० अम्बेडकर के पक्ष में अपना निर्णय दिया था।
              महाड़ चवदार तालाब सत्याग्रह (२० मार्च १९२७) सफल हुआ। इससे आहत रुढ़िवादी सवर्णो ने दलितों पर हमला कर दिया। कई लोग घायल हुए। डा० अम्बेडकर ने फौजदारी शिकायत दर्ज करवाई। दिनांक २१.७.१९२७ को न्यायमूर्ति हुड साहब ने अपराधियों को सजा सुनाई। इस निर्णय से उत्साहित होकर डा० अम्बेडकर ने अपने पत्र 'बहिष्कृत भारत ' में दिनांक २५, २६ दिसम्बर के लिये अगले कार्यक्रम की घोषणा कर दी। लेकिन रुढ़िवादी सवर्णो ने दिनांक १२.१२.१९१७ को महाड़ सेशन जज की कोर्ट में मुकदमा नं०४०५/१९२७ दाखिल करके एक पक्षीय मनाही हुक्म प्राप्त कर लिया।
             इस बीच दिनांक ९-१० दिसम्बर,१९२७ को 'वृहद महाराष्ट्र परिषद ' की एक बैठक वेदशास्त्र पारंगत नारायण शास्त्री मारेठी की अध्यक्षता में अकोला में सम्पन्न हुई जिसमें सैकड़ों वेद शास्त्र पारंगत ब्राह्मणों ने भाग लिया। इस ब्राह्मण परिषद ने सर्वानुमत से १० प्रस्ताव पारित करके सामाजिक समरसता की जोरदार वकालत की। इसके अतिरिक्त प्रस्ताव १३ पारित करके यह घोषणा की कि 'अस्पृश्यता शास्त्र आधारित नहीं है और मानव मात्र को वेद अध्ययन का अधिकार है ' । साथ ही पाठशाला, धर्मशाला, मंदिर, बावड़ी, कुँआ, तालाब आदि स्थानों पर सभी को प्रवेश करने का अधिकार है। किसी को अस्पृश्य नही मानना चाहिये।
              इस परिषद के मुख्य संचालकों में पांडुरंग भास्कर शास्त्री पालेय (ब्राह्मण ) थे। डा० अम्बेडकर को जो अपेक्षायें थीं वह इस परिषद ने प्रस्ताव द्वारा पारित की। महाड़ के रूढ़िवादी सवर्णों के मुकदमें के प्रत्युत्तर में डा० अम्बेडकर ने पांडुरंग भास्कर शास्त्री पालेय द्वारा पुस्तक में से उद्धृत श्लोकों को कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया। इसमें स्पष्ट किया गया था कि अस्पृश्य के स्पर्श से पानी या कोई भी वस्तु अपवित्र नहीं हो जाती। शास्त्री जी (पालेय) ने स्मृतियों के आधार पर सभी साक्ष्य जमा किये थे। परिणामस्वरूप मुकदमा करने वाले मुख्य वादी पांडुरंग रघुनाथ धारप की हताशा से मृत्यु हो गई। अन्य आठ रुढ़िवादी सवर्ण दूसरी सुनवाई पर उपस्थित नहीं हुए। अंत में निचली अदालत ने मुकदमा खारिज कर दिया।
             'समता संघ' के प्रमुख कार्यकर्ता कमलकांत वासुदेव चित्रे (१८९४-१९४७) सिद्धार्थ कालेज की स्थापना एवं विकाश कार्यो में बाबा साहब के सहयोगी थे। वह पीपुल्स एजूकेशन सोसाइटी के गवर्निग बॉडी के सदस्य थे। डा० बाबा साहेब के पुनर्विवाह के अवसर पर दिल्ली में विवाह रजिस्ट्रार के समक्ष डा० शारदा कबीर (वधु) के पक्ष में हस्ताक्षर करने वाले डा० शारदा के भाई बसंत कबीर एवं कमलकांत चित्रे ब्राह्मण थे।
       'स्वतंत्र मजदूर पक्ष ' के महामंत्री बैरिस्टर समर्थ कायस्थ थे। वकालत के व्यवसाय में डा० बाबा साहब उन्हें अपने साथ रखते थे। वह 'म्युनिसिपल कामदार संघ ' के उपाध्यक्ष भी थे।
            १९४५ में डा० अम्बेडकर को सर्वप्रथम सम्मान पत्र से सम्मानित करने वाले शोलापुर म्युनिसिपल के अध्यक्ष डा० वी. वी. मूले ब्राह्मण थे। सम्मान पत्र के प्रत्युत्तर में डा० अम्बेडकर ने कहा कि आज से २० वर्ष पूर्व डा० वी.वी. मूले के सहयोग से ही वह समाज सेवा के कार्य में सक्रियता से जुड़े।
         स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में डा० अम्बेडकर को सम्मिलित करने के लिये आग्रह करने वाले चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य (रामजी) भी ब्राह्मण थे।
            १९४८ में डा० अम्बेडकर ने शारदा कृष्ण राव कबीर नामक सारस्वत ब्राह्मण महिला के साथ पुनर्विवाह किया। महाराष्ट्रीयन परंपरा के अनुसार विवाह पश्चात डा० अम्बेडकर ने उनका सविता नामकरण किया। डा० अम्बेडकर ने दिनांक १.९.१९५७ को राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद के हाथों मिलिंद महाविद्यालय औरंगाबाद का शिलान्यास करवाया। डा० राजेन्द्र प्रसाद कायस्थ थे।
             डा० अम्बेडकर ने १९५४ में भारतीय बौद्ध महासभा नामक संस्था का रजिस्ट्रेशन कराया। इस बौद्ध संस्था में एक ट्रस्टी के रूप में बाल कृष्ण राव कबीर (डा० शारदा कबीर के भाई एवं बाबा साहेब के साले) को लिया गया जो कि सारस्वत ब्राह्मण थे। भारतीय बौद्ध महासभा का प्रथम नाम भारतीय बौद्ध जनसंघ (१९५१) था। तत्पश्चात भारतीय बौद्ध जन समिति (१९५३) और अंत में भारतीय बौद्ध महासभा रखा गया।
         पूज्य बोधिसत्व डा० बाबा साहेब अम्बेडकर तथागत बुद्ध के शरण में गए...'बुद्धं शरणं गच्छामि.....।' तथागत बुद्ध पूर्व में सिद्धार्थ थे, जिनकी प्रारंभिक शिक्षा आठ ब्राह्मणों - कोंडम्य, राम, ध्वज, लक्ष्मण, सुयां, सुदत्र, भोज द्वारा सम्पन्न हुई। भगवान बुद्ध के प्रथम पाँच शिष्य पंचवर्गीय भिक्षु - कौंडिन्य, वम्प, महानाम, अश्वजित एवं भद्दीय भी ब्राह्मण ही थे। महाकारुणिक बुद्ध के भिक्षु संघ में ७५ प्रतिशत ब्राह्मण थे। उनके प्रमुख शिष्य धम्म सेनापति सारिकपुत्र (बुद्ध का दाहिना हाथ), महामोगल्लायन (बायाँ हाथ), कौंडिन्य (मेरुदण्ड), महाकाश्यम (बायाँ कान) भी ब्राह्मण ही थे।
               बौद्ध धर्म का विदेशों में प्रचार करने वाले प्रमुख रुप से ब्राह्मण ही थे। अन्त में महात्मा बुद्ध की पवित्र अस्थियों के लिए जब आपस में कलह हुई, तब उसका समाधान करने वाला शिक्षक द्रोण ब्राह्मण ही था Iउन्होंने गौतम बुद्ध की पवित्र अस्थियाँ जिस पात्र में रखी गईं थी, वह मिट्टी का पात्र मांगा और कहा, 'मुझे यह खाली मटका दे दो, मैं उसके ऊपर कुंभ को स्तूप बनवाकर पूजा करुँगा।' थोड़ी देर से आने वाले पिप्पली वन के मौर्यों को बची हुई राख एवं कोयले को स्वीकार कर संतोष करना पड़ा था। इस प्रकार कलह के स्थान पर दस स्तूपों का सृजन उस ब्राह्मण द्रोण की दूरदृष्टि का परिणाम था।
           दिनांक १४ अक्टूबर, १९५४ को विजया दशमी के दिन नागपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा स्वीकार करने वाले एडवोकेट अनंत रामचन्द्र कुलकर्णी (मंत्री, बौद्ध समिति) और नागपुर सेशन जज . न्यायमूर्ति भवानी शंकार नियोगी भी ब्राह्मण थे। कुलकर्णी १९४० से नागपुर में बौद्ध धर्म का प्रचार कर रहे थे। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित नियोगी कमीशन रिपोर्ट में इस बौद्ध कार्यकर्ता ने ईसाई धर्मान्तरण के विरोध की सिफारिश की थी।
           इस प्रकार समाज सेवा कार्य एवं संघर्ष में ब्राह्मणों ने डा० अम्बेडकर का पूरा साथ दिया था। इसे हम डा० बाबा साहेब अम्बेडकर एवं ब्राह्मणों के मध्य ऋणानुबंधी सम्बन्ध कहें अथवा मात्र संयोग....... किन्तु सत्य, हकीकत, वास्तविकता यही है।

(लेखक - धम्मबन्धु डॉ० पी. जी.ज्योतिकर, भारतीय बौद्ध महासभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है और डा० भीमराव अम्बेडकर पर लिखित शोध-प्रबन्ध पर उन्हें डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त है)