Monday, January 16, 2017

ЁЯНЛ *!! рдордз-рд▓िंрдмुрдкाрдг्рдпाрдЪे рдЬाрджुрдИ рдЧुрдгрдзрд░्рдо !!*

🍋 *!! मध-लिंबुपाण्याचे जादुई गुणधर्म !!*

रिकाम्या पोटी मध-लिंबूपाणी घेण्याचे हे 8 फायदे तुम्हाला माहित आहे का ?

सकाळी रिकाम्या पोटी गरम पाण्यासोबत मध आणि लिंबाचा रस घेतल्यास तुमचं  वजन नक्कीच घटू  शकतं मात्र  वजन कमी करण्यासोबतच अनेक जादुई गुणधर्म दडले आहेत या  'मध - लिंबू' मिश्रित पाण्यात तर मग पहा काय काय  करू शकते मध – लिंबुपाणी.....

*कसे बनवाल हे मिश्रण ?*

एक मोठा ग्लास कोमट पाण्यात अर्ध्या लिंबाचा रस  आणि एक टीस्पून मध घेऊन मिश्रण एकत्र करा. मधुमेही देखील हे मिश्रण घेऊ शकतात. हे मिश्रण घेतल्या नंतर अर्धा  तास चहा , कॉफी  घेणे कटाक्षाने टाळा. तुम्हाला सुडोल आणि सुंदर दिसण्यासाठी हे मिश्रण नक्कीच मदत करेल .

🍋 *!! मध - लिंबुपाण्याचे फायदे !!* 🍯

◆ *बद्धकोष्ठता दूर ठेवते...*
रोज सकाळी  मध - लिंबुपाण्याचे मिश्रण घेतल्यास पचनशक्ती सुधारण्यास व शौचास सुलभ होण्यास  मदत होते . गरम पाण्यामुळे आतड्यांचे कार्य  सुधारते आणि शौचातील कडकपणा दूर होऊन बद्धकोष्ठ्तेपासून आराम मिळतो .

◆ *झटपट वजन कमी करण्यास मदत करते...*
मध - लिंबुपाणी पोट साफ करण्यासोबतच तुमचे वजन कमी करण्यासही मदत करते. यामधील पेक्टिन नामक फायबर तुम्हाला प्रसन्न ठेवते. मध - लिंबू मिश्रित पाणी पोटात  अल्काईन स्थिती तयार करत असल्याने तुमचे वजन झटपट कमी करण्यास मदत होते . (पहा 'अगंबाईअरेच्चा2' साठी सोनाली कुलकर्णीने कसं घटवलं 13किलो वजन)

◆ *पचनशक्ती सुधारते...*
निरोगी आरोग्यासाठी उत्तम पचनशक्ती गरजेची असते.  मध - लिंबुपाण्याचे मिश्रण  पचनप्रक्रियेचा मार्ग सुधारण्यास मदत करते. लिंबू  यकृताला जड अन्नपदार्थापासून  पित्त निर्माण करण्यास मदत करते. तर मधातील  जीवाणू मारण्याची क्षमता शरीरात संसर्ग  होऊ देत नाही . याशिवाय हे मिश्रण शरीरातील विषारी घटक बाहेर टाकते .

◆ *मोठ्या आतड्याचे कार्य सुधारते...*
मानवी शरीरात अनेक विषारी घटकांची निर्मिती होत असते त्यामुळे कर्करोगासारखे आजार होण्याचा संभव असतो .मध - लिंबुपाण्याचे मिश्रण लहान तसेच मोठ्या आतड्यांना  चालना देते व  विषारी घटकांचा नाश करते.  आयुर्वेदानुसार हे मिश्रण  नैसर्गिकरित्या मोठे आतडे  स्वच्छ करते, अन्नातील पोषक द्रव्ये ग्रहण करते  व विषारी घटक दूर ठेवते.

◆ *उत्साहवर्धक व प्रसन्न ठेवते...*
सकाळी उठाल्यानंतरदेखील जर तुम्ही निरुत्साही राहत असाल तर मध - लिंबुपाण्याचे मिश्रण सकाळी नक्की प्या ! कारण यामधील मध तुम्हाला तत्काळ उत्साही करते तर पाण्यामुळे  मेंदूला नवीन रक्ताचा पुरवठा झाल्याने मनही प्रसन्न राहते . शरीरातील विषारी घटकांमुळे येणाऱ्या सुस्तीपणाला लिंबू दूर ठेवते त्यामुळे तुम्हाला दिवसभर प्रसन्न वाटते .

◆ *मूत्रमार्गाच्या समस्या दूर करते...*
रोगजंतूसंसर्गाचा प्रादुर्भाव टाळण्याचे महत्वाचे काम मध करते.  मध - लिंबुपाण्याचे मिश्रण शरीरातील अपायकारक घटक मुत्रामार्गे शरीरातून बाहेर टाकते. तसेच मूत्रमार्ग स्वच्छ करते. स्त्रियांमध्ये  मूत्रमार्गात इन्फेकशन होण्याचे प्रमाण अधिक असते अशावेळी हे मिश्रण नक्कीच अतिशय उपयुक्त आहे.

◆ *मुखातील दुर्गंधी दूर करते...*
लिंबातील आम्ल तत्व , मध व पाण्याबरोबर मिसळल्याने तात्काळ तोंडातील दुर्गंधी दूर होते. लिंबू तोंड स्वच्छ  करून लाळ ग्रंथी प्रवृत्त करतात व रोगजंतुंचा नाश करतो. तोंडात राहिलेल्या अन्नकणांमुळे तसेच जिभेवर तयार होणाऱ्या पांढरया थरामुळे अनेकदा दुर्गंधी येते मात्र  मध - लिंबुपाण्याचे  मिश्रण  नैसर्गिकरीत्या दुर्गंधी दूर करते.

◆ *त्वचेची कांती उजळते...*
लिंबू त्वचेची कांती उजळवण्यास  अत्यंत गुणकारी आहेच पण त्याच बरोबर लिंबामुळे होणारी रक्तशुद्धी व नंवीन रक्त पेशी निर्माण करण्याची क्षमता त्वचेचा पोत सुधारते. तर मध आणि पाणी विषारी घटक काढून त्वचेला पुनरुजीवीत करते..
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Sunday, January 15, 2017

рдиाрдо рдоें рд╕рдм рд░рдЦा рд╣ै

इसी धरती के एक मशहूर नाटककार शेक्सपियरजी लिख गए हैं कि ‘नाम में क्या रखा है’. ऐसा लिख कर वे नामों के साथ कुश्ती लड़वा गए हैं. बताइए भई, नाम के लिए आदमी क्या नहीं करता? मरे को जिंदा और जिंदा को मरा हुआ बताने में नाम का बड़ा रोल होता है. नाम में क्या नहीं रखा प्यारे. नाम के लिए लोग बदनाम तक होने का मौका ढूंढ़ते हैं. बदनाम होते ही उन का नाम हो जाता है, जैसे अपने आसाराम बापू. ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’, यह मंत्र न जाने कितने नामशुदा बदनाम हो कर जपते रहते हैं. शेक्सपियरजी, नाम में ही सबकुछ रखा है.

मेरा एक दोस्त दो नंबर की ग्रेजुएशन डिगरी लिए बैठा है. एक बार नाटकों की बात चली, तो तपाक से ज्ञान बघारते हुए बोला, ‘यार, सैक्सपियर ने क्या नाटक लिखा है रोमियोजूलियट...’

मैं ने फौरन उन्हें टोका, ‘यार दो नंबरी, क्यों बेचारे सीधेसादे विदेशी नाटककार का नाम बदनाम करते हो? नाम तो सही लिया करो. सैक्सपियर नहीं, शेक्सपियर बोलो.’

अब बताइए दिवंगत शेक्सपियरजी, नाम में कुछ रखा है कि नहीं? मेरे एक दूसरे दोस्त जानेमाने व्यंग्यकार हैं. वे कारखाने में नौकरी करते हैं. अखबारों में भी वे अकसर व्यंग्य कौलम लिखते हैं. एक अंगरेजीदां ने उन्हें शुभ काम का आमंत्रण अशुभ उच्चारण में भेज दिया. दोस्त का नाम है सुरेश वैश्य. अंगरेजीदां मेजबान ने लिफाफे पर उन्हें संबोधित किया ‘सुरेश वैश्या’. अच्छेभले कारखाना कामगार का नाम कोठे से जोड़ दिया. वैश्य को भैंस भी लिखा होता, तो सहन होता.

व्यंग्यकार दोस्त खुद पर हुए व्यंग्य से बिफरे हुए मुझे लिफाफा दिखाने आए. मैं ने उन्हें समझाया. उन की आग को बुझाते हुए कहा, ‘यार, गलती मेजबान की नहीं, अंगरेजी भाषा का आविष्कार करने वाले की है. चूंकि ‘राम’ को अंगरेजी में ‘रामा’ लिखा जाता है, सो आप को बेचारे ने ‘वैश्या’ लिख भेजा. मेजबान के नेक इरादे में आप का पेशा बदलने का इरादा कतई शामिल नहीं होगा.’

तो देवियोसज्जनो, नाम में ही सबकुछ रखा है मानोजानो. आप मशहूर सैक्सपियर, माफ करें शेक्सपियर के झांसे में न आएं. मैं किस से कहूं? मैं खुद भी इस नाम के फेर का सताया हुआ हूं. आप चाहें तो पत्नी का सताया भी कह सकते हैं.

एक बार फोन पर अपने सुपरिचित, सुदूर बुकस्टौल वाले से पूछ रहा था, ‘बौस, सरिता, मुक्ता नहीं आईं क्या? आएं तो बता देना?’

फोन पर मेरी बातचीत सुन रही श्रीमतीजी हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू और बेलन एकसाथ ले कर प्रकट हुईं. वे दांत पीसते हुए गरजीं, ‘मैं रसोई में से सब सुन रही थी, बहरी नहीं हूं. तुम सूने कमरे में किन सौतनों से बतियाते रहते हो. मैं बूढ़ी हो गई हूं न? बुला लो उस सौत सरितामुक्ता को, रचाओ रासलीला.

‘शर्म नहीं आती तुम्हें 2 बच्चों के बाप हो कर भी, पराई संतानों की मांओं पर लार टपकाते हुए?’

अचानक आई मुसीबत को टालने की मैं ने कोशिश की. गुस्साई पत्नी को दूर से ही समझाया, ‘अरी मेरी सुंदरी सुनयना, मैं तुम्हारी सौतनों का नहीं, पत्रिकाओं का नाम ले रहा था. गैर की मांओं से नहीं बुकस्टौल वाले से बात कर रहा था. अपना गुस्सा शांत करो देवी, मेरी जान बख्शो. जाओ, दोबारा रसोई की ओर जाओ.’

नाम का यह फेर जो न करा दे, थोड़ा समझो. अपनी बंबई जिस का नाम मुंबई हो गया है नाम की मारी है. बंबई नगरिया का बखान अपने लंबे डौन अमिताभ ने ‘डौन’ नामक फिल्म में किया है. डौन के श्रीमुख (असलियत में किशोर कुमार के श्रीमुख) से आप ने बंबई नगरिया के नामों वाला गीत सुना ही होगा, ‘ई है बंबई नगरिया तू देख बबुआ...’

गीत में अमिताभजी महाराज कहते हैं, ‘कोई बंदर नहीं है, फिर भी नाम बांदरा, चर्च का गेट है चर्च है लापता, बिन धोबी का धोबी तालाब देखो...’

इस गीत से हमें बंबई या मुंबई नगरिया की काफीकुछ जानकारी हासिल होती है. जानकारी हासिल करने के लिए और भी कई सोर्स हैं जैसे अखबार, पत्रपत्रिकाएं. तमाम नामों का होनाखोना, सोना हमें इन्हीं से हराम होता है. नाम होता?है तो अखबार लेता है, वरना क्या लेगा. ‘इसे’ सम्मान, ‘उसे’ जूता, ‘मुझे’ अपमान, ‘तुझे’ जेल तो लिख नहीं देगा अखबार.

मान हो या अपमान, नाम तो जरूरी है. लेकिन साहब शेक्सपियर कहते थे, ‘नाम में क्या रखा है?’ अगर इस शीर्षक से लिखी हरि भटनागर की कहानी में भटनागरजी का नाम न छपा होता. लेखक आपत्ति जड़ता, ‘वाह जी, वाह, नाम गायब कर दिया मेरा. मैं कैसे साबित करूं कि ‘नाम में क्या रखा है’ कथा मेरी है या गैर की? अब रचना में दाम के साथ नाम हो तो ठीक वरना...’

संपादकजी कथाकार को लाख बहलाएं, ‘मान्यवर दाम लीजिए. नाम में क्या रखा है?’ तो कथाकार टेसू की तरह अड़ेगा ही, ‘वाह जी वाह, नाम ही में तो सबकुछ रखा है.

‘बताइए, आप की पत्रिका में आप की जगह संपादक में मेरा नाम छप जाए तो...? आसाराम बापू की जगह राष्ट्रपिता बापू छप जाए या राष्ट्रपिता बापू की जगह आसाराम बापू छप जाए तो...?’

नाम ही तो बदनाम होता है बंधु, चाहे वो संत का हो या संत के आश्रम का. यह और बात है कि घरवालियां अपने घर वालों का नाम नहीं लेतीं, ऐजी, ओजी, चुन्नू के पापा, मुन्नू के बापू’ जैसे शब्दों से काम चला लेती हैं. सोचती हैं कि नाम में क्या रखा है.

देवियो, आप अपना भ्रम दूर कर लें. पुलिस इसी नाम के फेर में कभीकभी शरीफ की जगह गैरशरीफ, सज्जन के बजाय दुर्जन के घर का दरवाजा खटखटाने लग जाती है. यह चूक उसे कभीकभी महंगी पड़ती है. गैरशरीफ या दुर्जन अदालत में मानहानि का केस दर्ज करा देता है. ‘नामहिं हाथी पाइए, नामहिं हाथी पांव’.

आदरणीय शेक्सपियरजी ने ‘नाम में क्या रखा है?’ जैसी बात कह कर भले ही लाखों छपास पीडि़तों को नाम के पीछे रोज पत्रिकाओं के दफ्तर की परिक्रमा से छुटकारा दिलाने की नाकाम कोशिश की हो, लेकिन छपास पीडि़त कैसे मान लें कि ‘नाम में क्या रखा है?’

उस की इस पीड़ा यानी ‘नाम की पीड़ा’ का उपचार तो पत्रपत्रिकाओं में आएदिन छपने वाले नाम से ही होता है. अगर एक दिन न छपे, तो ‘दैनिक छपास पीडि़त’ के पेट और पैरों में कुछ होने लगता है. उसे लगता है कि अखबार के दफ्तर की ओर अब दौड़े कि तब. उसे कबीर याद आने लगते हैं, ‘काल करे सो आज कर, आज कर सो अब...’     

Saturday, January 14, 2017

рдирд░рдЧिрд╕ рдХी рд╢ाрджी рдХी рдмाрдд рд╕ुрди рд╣рд░ рд░ाрдд рдмाрде рдЯрдм рдоें рд▓ेрдЯрдХрд░ рд░ोрддे рдеे рд░ाрдЬ рдХрдкूрд░, рд╕िрдЧрд░ेрдЯ рд╕े рдЦुрдж рдХो рдЬрд▓ा рд▓िрдпा рдеा

आज बॉलीवुड फ्लैशबैक में हम ऐसी लव स्टोरी के बारे में बताएंगे जिसमें प्यार हुआ, इकरार हुआ लेकिन ये प्यार करने वाले कभी एक ना हो सके। ये दास्तां है नरगिस और राज कपूर के बेइंतहा मोहब्बत की। साल 1946... राज कपूर ने फिल्म 'आग' का निर्देशन शुरू कर दिया था। इस फिल्म के लिए राज कपूर स्टूडियो की तलाश में थे। उन्हें पता चला कि नरगिस की मां जद्दन बाई मुंबई के 'फेमस स्टूडियो' में रोमिया-जूलियट बना रही हैं।

वो 'फेमस स्टूडियो' के बारे में जानना चाहते थे इसलिए राज कपूर जद्दन बाई के घर पहुंच गए। वो नहीं जानते थे कि उस दिन उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ आने वाला है। उस दिन जद्दन बाई घर पर नहीं थीं। घर का दरवाजा उनकी बेटी नरगिस ने खोला। नर्गिस बेहद खूबसूरत थीं। इस पहली मुलाकात से नरगिस और राज कपूर दोनों की जिंदगी बदल गई। इस मुलाकात का राज कपूर पर इतना गहरा असर हुआ कि 27 साद बाद उन्होंने फिल्म बॉबी में उस पल को हूबहू पर्दे पर उतार दिया।

पहली मुलाकात में ही दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे थे। उस वक्त नरगिस क्या सोच रही थीं इस बारे में लेखक टीजेएस जॉर्ज की किताब 'द लाइफ एंड टाइम ऑफ नरगिस' में बखूबी बयां किया गया है। इस मुलाकात के बारे में नरगिस ने अपनी दोस्त नीलम को बताया था, 'नीली आंखों वाला एक मोटा सा ‘पिंकी’ घर आया था'। दरअसल, उस दिन दोनों की कोई बात नहीं हुई थी। राज कपूर नरगिस को घर में अकेले देख घबरा गए थे और तुरंत वापस लौट गए।

नरगिस से मुलाकात के बाद वो सीधा इंदर राज आनंद के घर पहुंचे। इंदर ने ही फिल्म 'आग' की स्क्रिप्ट लिखी थी। उन्होंने इंदर से कहा कि वो स्क्रिप्ट में किसी तरह नरगिस का रोल भी जोड़ दें। क्योंकि वही अब इस फिल्म की हीरोइन बनेंगी। इसके बाद राज कपूर दोबारा नरगिस से मिले और उन्हें फिल्म 'आग' के लिए साइन कर लिया। ये फिल्म 1949 में रिलीज हुई थी लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कामयाब नहीं हो सकी थी। लेकिन राज कपूर और नरगिस के दिल में प्यार की आग लग चुकी थी।

नरगिस राज को पसंद करने लगी थीं। राज कपूर के शादीशुदा होने के बावजूद नरगिस के साथ राज कपूर का रिश्ता रील से निकलकर रियल लाइफ में पहुंच गया था। अब नरगिस उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गईं थीं। दोनों के अफेयर से उनके परिवार वाले बेहद नाराज थे। कई बार तो दोनों को मिलने से रोका गया। लेकिन प्यार के इन पंछियों ने हर जंजीर को तोड़ दिया था। इसके बाद नरगिस ने फिल्म 'बरसात' में राज कपूर के साथ काम किया। इस समय तक नरगिस ने सोच लिया था कि उनका भविष्य अब पूरी तरह राज कपूर के साथ ही है।

मधु जैन की किताब 'द कपूर्स' के मुताबिक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब स्टूडियो में पैसे की कमी हुई तो नरगिस ने अपनी सोने की चूड़ियां बेच दी थीं। इतना ही नहीं उन्होंने कई दूसरी फिल्मों में काम करके आर.के फिल्म्स की तिजोरी फिर से भर दी थी। फिल्म 'बरसात' की शू‌टिंग के दौरान नरगिस की मां जद्दन बाई की मौत हो गई। अपनी मां की मौत के बाद नरगिस अकेली पड़ चुकीं थीं। वो वह ज्यादा से ज्यादा वक्त राज कपूर के साथ गुजारने लगीं।

10 मार्च 1950 को फिल्म 'बरसात' रिलीज हो गई और ताबड़तोड़ कमाई की। इसी फिल्म के इस एक रोमांटिक सीन ने आर.के फिल्म्स को उनका मशहूर लोगो दिया। राज कपूर और आर.के स्टूडियो, नरगिस के लिए इन दोनों से ज्यादा जरूरी कुछ नहीं था। नरगिस का सारा कामकाज उनके बड़े भाई अख्तर हुसैन संभालते थे। कहते हैं नरगिस की कमाई से ही उनके परिवार का खर्च चलता था। लेकिन जब नरगिस अपनी ज्यादातर कमाई आर.के स्टूडियो में लगाने लगीं तो उनके घर में हंगामा हो गया।

इतना ही नहीं नरगिस निर्माताओं के सामने ये शर्त भी रखने लगीं थीं कि उनकी फिल्म में हीरो राज कपूर को ही बनाया जाए। लेखिका किश्वर देसाई की किताब 'डार्लिंग जी' के मुताबिक, नरगिस के बड़े भाई अख्तर हुसैन बार-बार नरगिस से कहा करते थे- बेबी तुम अपनी जिंदगी बर्बाद कर रही हो। राज कपूर को भूल जाओ, अपना कामकाज करो, अपनी मेहनत करो। शादी करके अपना घर संसार बसाओ। क्यों इस चक्कर में बैठी हो? इस बात को लेकर अख्तर हुसैन और नर्गिस के बीच कई बार जबरदस्त बहस भी हुई।

राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर ने भी उन्हें समझाने की काफी कोशिश की लेकिन राज कपूर और नरगिस का रिश्ता जारी रहा। साल 1951 में फिल्म 'आवारा' रिलीज हुई और ब्लॉकबस्टर साबित हुई। ये वो फिल्म थी जिसने राज कपूर को नरगिस से बड़ा स्टार बना दिया था। इस फिल्म की ज्यादातर समीक्षाओं में ये लिखा गया कि राज कपूर और पृथ्वीराज कपूर के रोल के सामने नरगिस का किरदार दबा हुआ नजर आया।

फिल्म 'आह' के बाद राज कपूर ने फैसला लिया कि नरगिस किसी भी बाहर के निर्माता की फिल्म में काम नहीं करेंगी। इस फैसले से नरगिस के भाई और फिल्म इंडस्ट्री में उनके करीबी लोग बेहद नाराज हुए।

Wednesday, January 11, 2017

рдмाрдк

👉🏿पुरुषाचा बाप होतो...

🙏 बायको "गोड बातमी" सांगते ते ऐकून टचकन डोळ्यात पाणी येते......तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो...🙏

नर्सने ओंजळीत ठेवलेला काही पौंडाचा जीव जबाबदारीच्या प्रचंड ओझ्याची जाणीव करून देतो......तेव्हा पुरुषाचा बापहोतो 🙏

बायकोबरोबर जागवायच्या रात्री डायपर बदलणे, पिल्लाला कडेवर घेऊन फेऱ्या मारण्यात व्यतीत होऊ लागतात....
तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

मित्रांबरोबरच्या पार्ट्या आणि नाके नीरस वाटून संध्याकाळी पावलांना घराची ओढ लागते....
तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

"लाईन कोण लावणार" म्हणत सिनेमाची टिकिटे टेचात ब्लॅकने खरेदी करणारा, तोच जेव्हा शाळेच्या फॉर्मच्या लायनीत पहाटे पासून तासंतास इमानदारीत उभा रहतो....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

ज्याला उठवताना गजर हात टेकतात तोच, जेव्हा पिल्लाचा नाजुक हात किंवा पाय झोपेत आपल्या अंगाखाली येऊ नये म्हणून रात्रभर सावध झोपू लागतो....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

खऱ्या आयुष्यात एका झापडित कुणालाही लोळवू शकणारा पिल्ला बरोबरच्या खोट्या फाइटिंगमध्ये त्याच्या नाजुक चापटीनेदेखील गडाबडा लोळतो.....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

स्वतः कमीजास्त शिकला असला तरी पोराला "नीट अभ्यास कर रे" असे पोट तिडकिने सांगू लागतो.. तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

आपल्याच कालच्या मेहनतीच्या जोरावर आपला आज मजेत जगणारा अचानक पोराच्या उद्यासाठी आपलाच आज कॉम्प्रोमाइज करू लागतो...तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

ऑफिसात अनेकांचा बॉस बनून हुकुम सोडणारा शाळेच्या POS मध्ये वर्गशिक्षिकेसमोर कोकरु बनून, कानात प्राण आणून तिच्या इंस्ट्रक्शन्स अज्ञाधारकपणे ऐकतो...तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

आपल्या अप्रेझल, प्रमोशनपेक्षासुद्धा तो शाळेच्या साध्या यूनिट टेस्टच्या रिझल्टची देखिल जास्त काळजी करू लागतो...तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

आपल्या वाढदिवसाच्या ट्रीटपेक्षा पोराच्या बर्थडे पार्टीच्या तयारीत तो गुंगुन जातो.....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

गाडीतून सतत फिरणारा तो पोराच्या सायकलची सीट पकडून सायकलच्या मागे धावू लागतो.....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

आपण पाहिलेली दुनिया व केलेल्या चूका पोराने करू नयेत म्हणून प्रिचिंग सुरु करतो.....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

प्रसंगी पोराच्या कॉलेज अँडमिशनसाठी पैशाची थैली सोडतो किंवा याचनेकरिता "कॉन्टेक्ट्स" समोर हात जोडतो.....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

"तुमचा काळ वेगळा होता, आता जमाना बदलला, तुम्हाला काय कळणार नाही. This is generation gap! असे आपणच केव्हा तरी बोललेले संवाद आपल्यालाच ऐकू आल्यावर...आपल्या बापाच्या आठवणीने हळवा होऊन मनातल्या मनात त्याची माफी मागतो..
तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

पोरगा शिकून परदेश जाणार मुलगी लग्न करून परक्या घरी जाणार हे दिसत असून त्या करिता स्वतःच प्रयत्न करतो... तेव्हा तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

पोर मोठी करताना आपण कधी म्हातारे झालो हे लक्षात येत नाही आणि लक्षात येते, तेव्हा उपयोग नसतो....तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

कधी पोरांच्या संसारात अडगळ बनून, कधी आपल्या म्हातारी बरोबर वृद्धाश्रमाची पानगळ बनून, अगदीच नशीबवान असला तर नातवंडांसमवेत चार दिवस रमून.कसेही असले तरीभावी पिढीला भरभरून आशीर्वाद देत कधीतरी सरणावर चढतो...तेव्हा पुरुषाचा बाप होतो🙏

🙏🏽👍🏼तमाम वडिलांना शुभेच्छा.......👏

Saturday, January 7, 2017

рдХांрдЧ्рд░ेрд╕

मोदी जी, फेकू की तरह *७० साल-७०साल मत चिल्लाया* करो  देश व जनता को *उल्लू* मत समझो

मोदी जी
आप उस देश के *प्रधान मंत्री* हो जो देश *तीन सौ साल ग़ुलाम* रहा !
जिस देश को अंग्रेजो ने लूट खसोट कर ओर जातीवाद में बाट के बर्बाद कर इस देश की बाग़डोर कोंग्रेस को सोपी थी !

*194 7* में देश में *सुई*
नही बनती थी !
सारा देश *राजा रजवाड़ों* के झगड़ो में *बटा* हुआ था
देश के मात्र *पचास गाँवों में बिजली* थी !
पूरे *राजस्थान में मात्र बीस राजाओं के महल* में फ़ोन था !
किसी गाँव में नल नही थे।
पूरे देश में *मात्र दस बाँध* थे ! सीमाओं पे *मात्र कुछ सेनिक* थे ! *चार विमान थे बीस टेंक* थे !
देश की *सीमाएँ चारो तरफ़ से खुली थी !*
*खजाना ख़ाली था ऐसे बदहाल* में हमारा *हिंदुस्तान कोंग्रेस* को मिला था !
इन *साठ सालों में कोंग्रेस* ने हिंदुस्तान में *विश्व की सबसे बड़ी ताक़त वाली सेन्य शक्ति तैयार की*
*हज़ारों विमान -हज़ारो टेंक -लाखों फ़ैक्ट्रीया लाखों गाँवों में बिजली*
*हज़ारों बाँध लाखों किलोमीटर सड़कों का निर्माण परमाणु बम*
*हर हाथ में फ़ोन -हर घर में मोटर साई किल वाला मजबूत देश साठ में बना कर दिया हे कोंग्रेस ने !*
भारत ने पिछले ६० सालों में तरक्की भी बहुत की है और भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों ने कई इतिहास रच दिए हैं जिसकी वजह से भारत आज एशिया की दूसरी सब से बड़ी ताकत है।
1-भारत दुनिया का सर्व *श्रेष्ठ संविधान* बना चुका था...
2-भारत *एशियाई खेलों की मेजबानी* कर चुका था...
3- *भारत में भाखड़ा और रिहंद जैसे बाँध बन* चुके थे...
4- *देश भामा न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर का उद्घाटन कर चुका था..*
5- *देश में तारापुर परमाणु बिज़ली घर शुरू हो चुका था...*
6- *देश में कई दर्जन AIIMS, IIT, IIMS और सैकड़ों विश्वविद्यालय खुल km चुके थे..*
7- *नेहरु ने नवरत्न कम्पनियाँ स्थापित कर दी थी...*
8- *कईसालों पहले भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को लाहौर के अंदर तक घुसकर मारा था और लाहौर पर कब्जा कर लिया था।*
9- *पंडित नेहरु पुर्तगाल से जीत कर गोवा को भारत में मिला चुके थे...*
10- *नेहरु जी ने ISRO (Indian Space Research Organization) की शुरुआत कर दी थी...*
11- *भारत में श्वेत क्रांति की शुरुआत हो चुकी थी..*
12- *देश में उद्योगों का जाल बिछ चुका था..*
13- *इंदिरा जी पाकिस्तान के दो टुकड़े कर चुकी थी, पाकिस्तान १ लाख सैनिकों और कमांडरो के साथ भारत को सरेंडर कर चुका था।*
14- *तब भारत में बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो चूका था..*
15-  *इंदिरा जी ने सिक्किम को देश में जोड़ लिया था....*
16- *देश अनाज के बारे में आत्म निर्भर हो गया था.*
17- *भारत हवाई जहाज और हेलीकाप्टर बनाने लगा था...*
18- *राजीव गाँधी ने देश के घर घर में टीवी पहुंचा दिया था।*
19- *देश में सुपर कम्प्यूटर, टेलीविजन और सुचना क्रांति ( Information Technology) पूरे भारत में स्थापित हो चुका था..*
20- *जब मोदी प्रधान मंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब तक भारत सर्वाधिक विदेशी मुद्रा के कोष वाले प्रथम १० राष्ट्रों में शामिल हो चुका था*
21- *इनके अलावा..चन्द्र यान,*
22- *मंगल मिशन ,*
23- *GSLV,*
24- *मेट्रो,*
25- *मोनो रेल,*
26- *अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे,*
27- *न्यूक्लियर पनडुब्बी,*
28- *ढ़ेरों मिसाइल,पृथ्वी, अग्नि, नाग*
29- *दर्जनों परमाणु सयंत्र,*
30- *चेतक हेलीकाप्टर, मिग*
31- *तेजस, ड्रोन, अर्जुन टैंक, धनुष तोप,*
32- *मिसाइल युक्त विमान,*
33- *आई एन एस विक्रांत*
*विमान वाहक पोत......*

ये सब उपलब्धियां देश ने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले हासिल कर ली थी.....

हर काँग्रेसी मित्र इसे *हर तीन ग्रूप और तीन लोगो* को भेजे ता कि इन *मोदीजी के जुमले* और *अंधभक्तो की झुठी भक्ती सबको* पता चल जाये...👍

Thursday, January 5, 2017

MEDICINE

V.V.IMP message from central government. New step again.
This is definitely going to save u money..  

Dear All,

This is to inform you that medicines are prescribed (by doctors) by brand name & not by the generics (Ingredients). Hence we end up paying more money for the same medicine.

Follow these few steps to know more & start saving on your medical bills.

1. Simply goto www.Manddo.com (Medicines and Doctors online) goto medicines secton

2. Search the medicine name

3. Type the medicine name which you are using (e. g. Lyrica 75mg (Pfizer company)

4. It will show u medicine company, prices and Ingredients

5. Now main point CLICK ON 'SUBSTITUTE'

6. Don't be surprised to see that same drug is available at very low cost also. And that to by other reputed manufacturer. e. g. Lyrica by pfizer is for Rs. 768.56 for 14 tab (54.89 per tab). Whereas same drug by Cipla (Prebaxe) is available ONLY @ Rs. 59.00 for 10 tab (5.9 per tab)

Please don't delete this without forwarding.

Forward to all the contacts in your phone book.

Let the move by Supreme Court benefit everyone...

There was a big lobby by Pharma companies to stop generic medicines. But court kept the interest of common man and the medical need.

"Kindness Costs Nothing" - please share it with your groups
🔶Always help others🔶